कायदे-कानून नहीं देश का कल्चर बदलने पर काम कीजिए: शिव खेड़ा

Apr 29, 2018

धार्मिक और आध्यात्मिक गुरुओं से मोहभंग के इस दौर में मोटिवेशनल और मैनेजमेंट गुरु बेहतर मालूम पड़ते हैं। दोनों तरह के लोग जिंदगी को बेहतर बनाने की शिक्षा देते हैं। पहले वाले गुरु अगले जन्म को बेहतर बनाने पर ज्यादा जोर देते हैं तो बाद वाले गुरु इसी जन्म को। बाद वालों से शोषण का खतरा नहीं दिखता। शिव खेड़ा मोटिवेशनल गुरु हैं। अपने नाम के अनुरूप कल्याणकारी। देश-दुनिया घूम-घूमकर लोगों को अपनी असल क्षमता हासिल करने की प्रेरणा देते हैं। 15 किताबें लिख चुके हैं। शुरुआत सन 1998 में ‘यू कैन विन’ से की थी जो आज बेस्टसेलर किताबों में शुमार है। उनके सूक्ति वाक्य इतने मशहूर हैं कि कई जगह ऑटो के पीछे और दीवारों पर स्टिकरों के रूप में दिख जाते हैं। मसलनः ‘अगर आपके पड़ोसी पर अत्याचार और अन्याय हो रहा है और आपको नींद आ जाती है तो अगला नंबर आपका है।’ ‘जीतने वाले अलग चीजें नहीं करते, वे चीजों को अलग तरह से करते हैं।’ इन्हीं शिव खेड़ा से राजेश मित्तल की बातचीत के खास हिस्से पेश हैंः

 

आपने अपनी नई किताब का नाम ‘यू कैन अचीव मोर’ रखा है यानी जिंदगी में जो है, वह पर्याप्त नहीं है, ज्यादा हासिल करो लेकिन हमारे धर्मग्रंथों में संतोष की महिमा गाई गई है।

संतोष इंसान को ढीला और लापरवाह बना देता है। उसकी जिंदगी में कोई उत्साह नहीं होता। उसे कुछ पाना नहीं है। जो चल रहा है, ठीक है। वह बैठा है। दिन गुजार रहा है। अगर आपने शादी की है, आपका जीवनसाथी है, बच्चे हैं, मां-बाप हैं तो उन्हें ठीक-ठाक पालने-पोसने के लिए आपको मेहनत करनी ही होगी। यह जिम्मेदारी बैठे-ठाले पूरी नहीं होगी। लोगों ने संतुष्टि का गलत मतलब निकाल लिया है। अगर इंसान के हाथ-पांव ठीक चलते हैं तो उसे मेहनत करनी चाहिए। मौजूदा स्थिति को बेहतर बनाने के प्रयास करने चाहिए। हमने समाज से बहुत कुछ हासिल किया है, हमें वापस भी देना है। संतोष परले दर्जे का स्वार्थ है।

क्या महत्वाकांक्षा से मन की शांति भंग नहीं होती?
महत्वाकांक्षा भी दो तरह की होती है। एक मुनासिब और एक गैर-मुनासिब। गैर-मुनासिब महत्वाकांक्षा से मन की शांति भंग होती है। मेरी औकात होंडा गाड़ी की है और मैं प्राइवेट जेट की आकांक्षा पाल लूं तो मैं अपनी बर्बादी का रास्ता बना लूंगा। गैर-मुनासिब महत्वाकांक्षा लालच है।

आपका एक बड़ा मशहूर कोट हैः ‘अगर आपके पड़ोसी पर अत्याचार और अन्याय हो रहा है और आपको नींद आ जाती है, तो अगला नंबर आपका है।’ लेकिन आजकल के माहौल में यह प्रैक्टिकल नहीं लगता। हमारे एक लेखक दोस्त ने बस कंडक्टर को रास्ते में खड़े होकर पेशाब करने से रोका तो उनकी बुरी तरह पिटाई कर दी गई।
आज के माहौल में बस कंडक्टर को मालूम है कि उसका कुछ नहीं बिगड़ेगा। इस दौर में अपराधी को सुरक्षा मिलती है और ईमानदार को सजा। आज शिक्षा, राजनीति से लेकर धर्म तक हमारा सारा समाज भ्रष्ट है। इस सिस्टम में जो भी निकलता है, भ्रष्ट ही निकलता है। मेडिकल कॉलेज से पढ़ाई करने के बाद जब डॉक्टर निकलता है तो उसे बीमार नहीं, टारगेट नजर आता है। इंजीनियर कच्चे पुल बनाता है। पुलिसवाला खुद क्रिमिनल बन जाता है। जज सिर्फ फैसला सुनाता है, इंसाफ नहीं देता। आप यहां कितने भी कायदे-कानून बना लें, जब तक इस हिंदुस्तान का कल्चर नहीं बदलेगा, तब तक कुछ होने वाला नहीं है।

तो हम अपने देश में कल्चर कैसे बदलें?
कल्चर ऊपर से नीचे चलता है। लीडर सही तो उस परिवार की, उस संगठन की, उस देश का कल्चर ईमानदारी से काम करने का होता है। अपने देश में हमें अच्छे लीडर की आज भी तलाश है। ऐसा लीडर जो देश का हित अपने हित से ऊपर रखे, जो निस्वार्थ हो, सचाई और ईमानदारी से चले। ऐसा लीडर बड़ी जल्दी इस देश का नक्शा बदल कर रख देगा।

मौजूदा नेताओं में से किसी से उम्मीद?
अभी मुझे इनमें से किसी से उम्मीद नहीं।

नरेंद्र मोदी से भी नहीं?
लंबे अरसे बाद आशा की किरण दिखी थी लेकिन अब बहुत सारे लोग निराश हैं। ग्राउंड में बदलाव नहीं दिखाई दे रहा। रोजमर्रा की समस्याएं ज्यों की त्यों हैं बल्कि बढ़ रही हैं। अंग्रेजों ने इस देश के लोगों को हिंदू-मुस्लिम में बांटा था, बीजेपी ने तो हिंदू-हिंदू को बांटने का काम किया। सन 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी ने चुनाव जीतने की खातिर राजस्थान की संपन्न जाति जाटों को ओबीसी आरक्षण देने का ऐलान कर दिया। पार्टी जीत गई, देश हार गया।

राहुल गांधी से आस है?
70 साल से इस देश की जनता चुनाव से पहले नेताओं के झूठ सुनती आ रही है कि यह कर देंगे, वह कर देंगे। बाद में हुकूमत में आने पर करते कुछ नहीं। कांग्रेस हो या बीजेपी, सब एक जैसे हैं। बीजेपी 2014 में बहुत कुछ कहती थी। सत्ता में आने के बाद क्या रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ कोई कार्रवाई की? असल में सभी पार्टियों की आपस में मिलीभगत है। पावर में आने पर एक-दूसरे को परेशान नहीं करते। अभी देश में वोटिंग का जो ट्रेंड है, उसके मुताबिक देश भरोसे का वोट नहीं दे रहा, मजबूरी का वोट दे रहा है। तमिलनाडु में देखिए। एक बार अम्मा आती थीं तो दूसरी बार अन्ना। यूपी में देखिए, एक बार मायावती, दूसरी बार मुलायम। अभी जो सत्ता में है, यह ठीक नहीं है। इसे बाहर निकालो। तब दूसरा आ जाता था।

लेकिन मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ में तो तीन-तीन बार मुख्यमंत्री वही रहे हैं?
वहां विपक्ष मजबूत नहीं था।

2019 में क्या होगा?
कहना मुश्किल है। चुनाव बहाव या लहर पर चलते हैं। 2014 में नरेंद्र मोदी की लहर थी। घटिया से घटिया उम्मीदवार भी उस लहर में जीत गया। फिलहाल तो लहर नहीं दिख रही।

केजरीवाल के बारे में क्या कहेंगे?
उनसे भी बड़ी उम्मीदें थीं लेकिन उन्होंने भी अब दूसरी पार्टियों जैसे ही रंग-ढंग अपना लिए हैं। वह भी जात-पात की बात करते हैं, मजहब पर वोट लेते हैं।

तो आप खुद राजनीति में क्यों नहीं आ जाते?
कई वजहें हैं राजनीति में ना आने की।

कौन-सी वजहें?
सबसे बड़ी वजह तो सेहत ही है।

एक आम नैतिक दुविधा यह होती है कि दूसरा बंदा अच्छा हो या बुरा, सभी के साथ हम अच्छा ही बर्ताव करें यानी चाहे बिच्छू डंक मारे, उसे हर बार पानी से निकालना हमारा फर्ज है। ऐसा करें या जो अच्छे हैं, उनके साथ अच्छा और जो बुरे हैं, उनके साथ बुरा बर्ताव करें? क्या दुष्ट आदमी को उसी की भाषा में जवाब देना चाहिए, नहीं तो वह हमें कमजोर ही समझता रहेगा?
पृथ्वीराज चौहान ने मुहम्मद गोरी को 17 बार युद्ध में हराया और दरियादिली दिखाते हुए हर बार माफ कर छोड़ दिया, पर 18वीं बार मुहम्मद गोरी ने जयचंद की मदद से पृथ्वीराज चौहान को युद्ध में मात दी और बंदी बना कर अपने साथ ले गया। पृथ्वीराज की दरियादिली के कारण भारत ने सैकड़ों साल की गुलामी झेली। इतिहास से हम यही सीखे हैं कि हम कुछ नहीं सीखे। कहने में तो बड़ा अच्छा लगता है कि प्यार से सबको जीत सकते हैं। क्या राम रावण को प्यार से जीत पाए? गुंडा सीता को ले गया। राम को हथियार उठाकर उसका वध करना ही पड़ा। ऐसे ही गुरु गोविंद सिंह ने भी तलवार उठाई। उनका कहना था कि जुल्म करना पाप है, जुल्म सहना उससे भी बड़ा पाप है। कोई एक गाल पर चांटा लगा दे तो दूसरा गाल आगे कर देना, लोग कहते हैं, यह गांधीगिरी है तो मैं गांधीवादी नहीं हूं। लातों के भूत बातों से नहीं मानते। उन्हें मुंहतोड़ जवाब देना ही पड़ता है।

यानी सीधों के साथ सीधे और कमीनों के साथ कमीना हुआ जाए?
मैं यह लफ्ज़ नहीं दूंगा। यही कहूंगा कि कहीं प्यार से काम लेना पड़ता है और कहीं लातों से।

बीजेपी कई बार जातीय समीकरणों को देखते हुए भ्रष्ट छवि वालों को भी टिकट दे देती है ताकि पार्टी चुनाव जीत सके। यह रणनीति क्या ठीक है?
मैं इससे सहमत नहीं। बीजेपी ईमानदार कैंडिडेट खड़ा करे तो वह क्लीन स्वीप करेगी। उसने भी भ्रष्ट खड़ा कर दिया तो भ्रष्ट-भ्रष्ट में फर्क क्या रहा? उधर भी भ्रष्ट, इधर भी भ्रष्ट।

लेकिन ईमानदार आदमी चुनाव में जीत नहीं पाता। लालू जैसे भ्रष्ट, शहाबुद्दीन जैसे गुंडे जीत जाते हैं और शर्मिला जैसी संघर्षशील महिला हार जाती है। आप खुद भी तो सन 2004 में दक्षिण दिल्ली से लोकसभा का चुनाव निर्दलीय के रूप में लड़े थे। आप भी कहां जीत पाए थे?
वह चुनाव मैंने बिना तैयारी के, बिना समय दिए लड़ा था। लोगों ने कहा, आपने तो किताब लिखी है ‘यू कैन विन’ और खुद हार गए, लेकिन लोग तो अंतिम परिणाम देखते हैं और यह ठीक ही है।

आप पॉजिटिव एटिट्यूड अपनाने पर बहुत जोर देते हैं लेकिन जिंदगी में दोनों एटिट्यूट की जरूरत होती है। आपको नेगेटिव सोचना पड़ता है। आप यह सोच कर चलते हैं कि यह नहीं होगा तो हम क्या करेंगे। इसे मैनेजमेंट में कहते हैं कि प्लान बी तैयार करो।
इसे नेगेटिव सोच नहीं कहते। पॉजिटिव ही कहते हैं। आपका कोई हॉस्पिटल है। वहां पर ऑपरेशन होते हैं। बिजली का बंदोबस्त है लेकिन फिर भी जनरेटर भी रखते हैं इसलिए कि हर ऑपरेशन सफल हो, उसमें कोई कमी ना आए। जो एक जरनल होता है, वह प्लान ए, प्लान बी, प्लान सी, प्लान डी तक तैयार रखता है। इसे तैयारी कहते हैं। फेल होने की नहीं, सफलता की तैयारी।

सेल्फ हेल्प किताब हो या कोर्स, इनके साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह होती है कि कुछ दिन तो इंसान इन बातों को अपनाता है, धीरे-धीरे प्रेरणा फीकी पड़ती जाती है और रुटीन से बाहर हो जाती है। इस चुनौती से कैसे निपटें?
मेरे से यह सवाल अक्सर पूछा जाता है कि आपकी बातों को कितने लोग कितने लोग अमल में लाते हैं, मेरा जवाब होता है 10 फीसदी लोग 90 फीसदी बातों को अमल में लाते हैं और 90 फीसदी लोग 10 फीसदी बातों को ही। 10 फीसदी वाले जिंदगी में आगे बढ़ते हैं। बाकी कभी ज्योतिषी को फोन लगाएंगे, कभी कहेंगे मेरे स्टार्स अच्छे नहीं हैं।

कई बार ऐसा लगता है कि सेल्फ हेल्प किताबें मन के ऊपरी लेवल पर बदलाव लाती हैं। गहरे मन के स्तर पर बदलाव कैसे लाया जाए ताकि जो आत्मसुधार हो, वह स्थायी बन सके?
रिसर्च कहती है कि कोई इंसान अगर 31 दिन रोज किसी चीज की प्रैक्टिस करें तो वह आदत में शुमार हो जाती है। कोई 21 दिन बताता है तो कोई 61 दिन भी। मैं कहूंगा, 61 दिन कोई भी चीज रोज प्रैक्टिस में आती है तो वह आपकी जिंदगी में शुमार हो जाती है। आपको रोज अपनी अच्छाई को मजबूत करना है और कमी को कमजोर।

आजकल जो माहौल बन रहा है, छोटे बच्चों के साथ रेप की खबरें आ रही हैं, ऐसा लगता है जैसे इंसान हैवान बनता जा रहा है। ऐसे में इंसान पॉजिटिव कैसे रहे?
पहले अंतरात्मा नाम की चीज होती थी जो इंसान को गलत काम करने से रोक देती थी। समाज में आज संवेदनशीलता बची नहीं। ऐसे में निराशा तो होती है, पर आदमी को खुद को उठाना पड़ता है। हौसला रखकर चीजों को बदलने की लड़ाई जारी रखनी चाहिए।

रेप की समस्या का हल क्या है?
यह समस्या लॉ एंड ऑर्डर की है। सही कल्चर बनाने की जरूरत है। सही लीडर होगा तो सब ठीक हो सकता है।

आसाराम को सजा हुई। ऐसे गुरुओं के बारे में क्या कहेंगे? क्या गुरु जरूरी है?

जीवन में मार्गदर्शक तो होना ही चाहिए। अगर कोई कहता है कि मैं सेल्फ मेड हूं तो गलत कह रहा है। किसी ना किसी का योगदान उसकी जिंदगी में रहता ही है। गुरु तो जरूरी है लेकिन उसका चुनाव बहुत सावधानी से करना चाहिए और उसे परखते रहना चाहिए वरना धोखा खा सकते हैं।

  • जिंदगी की 3 सबसे बड़ी प्राथमिकताएं हैंः सेहत, रिश्ते और दौलत
  • कामयाब लोग कठिनाइयों के बावजूद सफलता हासिल करते हैं, न कि तब, जब कठिनाइयां नहीं होतीं।
  • जब हम अपनी हदों और सीमाओं को नहीं जानते, तो हम बड़े और ऊंचे काम करके खुद को ही हैरान कर देते हैं।
  • कोई आदमी अपने बारे में जो सोचता है, उसी से उसकी तकदीर तय होती है।
  • अनुशासन का पालन करें। आत्म-अनुशासन हमारे आनंद को खत्म नहीं करता, बल्कि बढ़ाता है।